नागरिकता संशोधन कानून की आड़ में लोगों को भड़काना शर्मिंदा करने वाली अराजक राजनीति

नागरिकता संशोधन कानून की आड़ में लोगों को भड़काना शर्मिंदा करने वाली अराजक राजनीति

विशेष संपादकीय: राजधानी दिल्ली समेत देश के अन्य कई शहरों में नागरिकता संशोधन कानून को लेकर जिस तरीके से धरने-प्रदर्शन के साथ बड़े पैमाने पर आगजनी, तोड़फोड़ और पुलिस पर हमले की घटनाएं हो रही हैैं वे गंभीर चिंता का विषय हैैं। इसलिए और भी, क्योंकि अराजक घटनाएं थमने का नाम नहीं ले रही हैैं। यह अंदेशा बढ़ रहा है कि इस तरह की घटनाएं जारी रहीं तो समाज में टकराव की स्थिति बन सकती है। नागरिकता कानून के विरोध में धरना-प्रदर्शन के साथ हिंसक घटनाओं के बढ़ते जाने के बाद भी नेताओं, कलाकारों और मीडिया के एक हिस्से के लोग नागरिकता कानून के हिंसक विरोध की या तो अनदेखी कर रहे या फिर उसे जायज ठहरा रहे हैैं।
अपनी बात कहने के नाम पर हिंसा स्वीकार नहीं

एक लोकतांत्रिक देश में किसी भी मसले का विरोध हो सकता है। हर मसले पर लोगों को अपनी बात कहने-रखने का अधिकार है, लेकिन इस अधिकार के नाम पर हिंसा को स्वीकार नहीं किया जा सकता और उस हिंसा को तो बिल्कुल भी नहीं जिसमें सरकारी-गैर सरकारी संपत्ति जलाई जा रही हो और पुलिस को निशाना बनाया जा रहा हो।

विरोध करने वाले तमाम लोगों को सीएए के बारे में जानकारी नहीं

यह हर दिन साफ हो रहा है कि नागरिकता कानून का विरोध करने उतरे तमाम लोगों को यही नहीं पता कि यह कानून किसके लिए है और उसका देश के किसी भी नागरिक से कोई मतलब नहीं, भले ही वह चाहे जिस पंथ का हो। इस अज्ञानता से तमाम सेलेब्रिटी कहे जाने वाल लोग भी ग्रस्त हैैं। इतना ही नहीं, उनके पास हर सवाल के जवाब में एक कुतर्क है। इन्हीं कुतर्कों से लैस लोग धरना-प्रदर्शन में पहुंच रहे हैैं। इनमें तमाम तो बहकाकर या फिर भाड़े पर लाए जा रहे हैैं।

अराजक तत्व हिंसा फैलाने का कोई मौका नहीं छोड़ रहे

उन्हीं के बीच अराजक तत्व हिंसा फैलाने का कोई मौका नहीं छोड़ रहे हैैं। दिल्ली, यूपी, बिहार की घटनाएं खास तौर पर यही बता रही हैैं। ऐसे तत्वों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई होनी ही चाहिए, लेकिन धरना-प्रदर्शन करने वाले उनका बचाव कर रहे हैैं। अराजक विरोध से पल्ला झाड़ कर वे खुद को शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारी करार दे रहे हैैं और हिंसा के लिए पुलिस और सरकार को जिम्मेदार ठहरा दे रहे हैैं। यह अंध विरोध की अति है।

इस कानून से किसी भी भारतीय मुसलमान का अहित नहीं होगा

हालांकि सरकार बार-बार कह रही है कि नागरिकता संशोधन कानून से किसी भी भारतीय मुसलमान का अहित नहीं होने जा रहा है, फिर भी यह अफवाह सुनियोजित तरीके से फैलाई जा रही है कि यह कानून देश के मुसलमानों के खिलाफ है। इसी के साथ शरारतपूर्ण तरीके से यह भी जोड़ा जा रहा कि नागरिकों का राष्ट्रीय रजिस्टर यानी एनआरसी के जरिये धर्म के आधार पर पहचान की जाएगी और ऐसा करते समय मुस्लिम नागरिकों को घुसपैठिया बता दिया जाएगा। ऐसा शरारत भरा दुष्प्रचार तब किया जा रहा जब एनआरसी की प्रक्रिया और उसके नियम तय किए जाने शेष हैैं। हालांकि यह भी स्पष्ट है कि प्रस्तावित एनआरसी असम में लागू एनआरसी से अलग होगा, लेकिन उसे असम जैसा ही बताने की होड़ मची है।

सरकार ने कहा- किसी भी भारतीय नागरिक को एनआरसी से आशंकित होने की जरुरत नहीं

आम जनमानस को भयभीत करने के लिए यहां तक कहा जा रहा है कि लोगों और खासकर भारत के मुसलमानों को खुद को भारतीय नागरिक साबित करने के लिए बहुत पापड़ बेलने पड़ेंगे। सरकार ने लगातार यह स्पष्ट किया है कि किसी भी भारतीय नागरिक को एनआरसी को लेकर आशंकित होने की जरुरत नहीं है, लेकिन नेताओं का एक वर्ग एनआरसी पर सरकार को घेरने के लिए लगातार समाज में भ्रम फैला रहा है। एनआरसी को एक हौवे का रूप तब दिया जा रहा है जबकि दुनिया का हर देश अपने नागरिकों का रजिस्टर तैयार करता है। सरकार अपनी इसी जिम्मेदारी का निर्वाह करने की प्रतिबद्धता जता रही है, लेकिन उसे इस रूप में पेश किया जा रहा जैसे सरकार कोई नया और गैर जरूरी काम कर रही हो। ध्यान रहे आजादी के बाद 1951 में जनगणना के बाद पहला एनआरसी तैयार किया गया था।

मनमोहन ने वाजपेयी सरकार से कहा था- बांग्लादेश से आए प्रताड़ित अल्पसंख्यकों को नागरिकता दें

हर देश अपने नागरिकों के लिए कुछ अलग नियम बनाता है और शरणार्थियों के लिए अलग। वे शरणार्थियों को नागरिकता भी प्रदान करते हैैं, लेकिन कुछ नियमों और शर्तों के साथ। असम और अन्य पड़ोसी राज्यों में बांग्लादेश से आए लाखों शरणार्थियों को राहत देने की बात समय-समय पर तमाम दलों के नेता करते रहे, लेकिन किया कुछ नहीं। खुद मनमोहन सिंह ने 2003 में वाजपेयी सरकार से यह मांग की थी कि बांग्लादेश से प्रताड़ित होकर आए अल्पसंख्यकों को नागरिकता दी जानी चाहिए। यह मांग उन्होंने राज्यसभा में नेता विपक्ष के रूप में की थी। उनका यहां तक कहना था कि बांगलादेश जैसे देशों के प्रताड़ित अल्पसंख्यकों को नागरिकता देने के मामले में हमें उदारता दिखानी चाहिए, क्योंकि यह हमारा नैतिक दायित्व बनता है।

जिसे 2003 में नैतिक दायित्व बताया जा रहा था उसे 2019 में अनावश्यक काम करार दिया जा रहा

क्या यह अजीब नहीं कि जिसे 2003 में नैतिक दायित्व बताया जा रहा था वह 2019 में अनावश्यक काम करार दिया जा रहा है? यह भी ध्यान रहे कि कुछ इसी तरह की मांग माकपा नेता प्रकाश कारत ने तब की थी जब मनमोहन सिंह प्रधानमंत्री थे। करात ने प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को यह भी याद दिलाया था कि इस बारे में नेता विपक्ष के तौर पर उन्होंने क्या कहा था? अब जब ऐसा ही किया गया तो एक तूफान सा खड़ा कर दिया गया। आखिर इस नतीजे पर क्यों न पहुंचा जाए कि नागरिकता कानून का विरोध केवल राजनीतिक लाभ के लिए किया जा रहा है और लोगों को जानबूझकर बरगलाया जा रहा है?

असम में एनआरसी तैयार करने का काम राजीव गांधी के समय असम समझौते के तहत किया गया

आज मनमोहन सिंह के साथ कांग्रेस भी यह भूलना पसंद कर रही है कि बांग्लादेश से पलायन करके आए अल्पसंख्यकों को लेकर उसकी क्या मांग थी? क्या वह एक दिखावटी मांग थी और इसीलिए दस साल तक संप्रग सरकार ने बांग्लादेशी शरणार्थियों के बारे में कोई निर्णय नहीं लिया? कांग्रेस को यह नहीं भूलना चाहिए कि असम में एनआरसी तैयार करने का काम उस समझौते के तहत किया गया जो राजीव गांधी ने प्रधानमंत्री रहते समय वहां के नेताओं से किया था।

सोनिया कानून के विरोधियों के साथ खड़ी हैं, लेकिन शांति की अपील करना जरूरी नहीं समझतीं

कम से कम असम से राज्यसभा सदस्य रहे मनमोहन सिंह तो इस सबसे भली तरह परिचित ही होंगे। किसी मसले पर वोट बैैंक की राजनीति नई नहीं है, लेकिन नागरिकता कानून और प्रस्तावित एनआरसी को लेकर तो देश को शर्मिंदा करने वाली अराजक राजनीति की जा रही है। सोनिया गांधी नागरिकता कानून के विरोधियों के साथ खड़ी होना पसंद कर रही हैैं, लेकिन शांति की अपील करना जरूरी नहीं समझ रहीं।

जब सुप्रीम कोर्ट इस कानून की संवैधानिकता की परख करने को तैयार है फिर अनावश्यक प्रदर्शन क्यों

कांग्रेस, तृणमूल कांग्रेस और अन्य जो विपक्षी दल नागरिकता कानून को लेकर मोदी सरकार को घेर रहे हैैं वे सुप्रीम कोर्ट भी पहुंचे हैैं। अगर उन्हें सुप्रीम कोर्ट पर भरोसा है तो उसके फैसले का इंतजार क्यों नहीं करते? वे इस कानून को वापस लेने की मांग कर रहे हैैं, लेकिन क्या संसद से पारित कानून को खारिज करना संविधान और लोकतंत्रसम्मत है? आखिर जब सुप्रीम कोर्ट नागरिकता कानून की संवैधानिकता की परख करने को तैयार है तो फिर अनावश्यक धरना-प्रदर्शन और हिंसा के जरिये देश को अशांति की आग में क्यों झोंका जा रहा है?

सच की शक्ति

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